ब्लौग सेतु....

17 दिसंबर 2017

रवायतों में न सही अब खिदमतों ..


हमारी किस्सागोइ   न हो..इसलिए
ख्वाबों को छोड़ हम हकीकत की 
पनाह में आ गए हैं,
अजी छोड़िए.. 
उजालों को..
यहाँ पलकें भी मूंद जाती है,
अंधेरा ही सही.. 
पर आँखें तो खूल जाती है,
हमने उम्मीद कब हारी है?
नासमझी को फिर 
सिफत समझदारी से समझाने में
ही कई शब गुजारी  हैं,
अब सदाकत के दायरे भी सिमटे 
तभी तो झूठ में  सच के नजारें हैं
जख्म मिले हैं अजीजों से
निस्बत रिश्तों से कुछ दूरी बनाए रखे हैं
छोड़िए इन बातों को..
जिन्दगी ख्वाबों ,ख्यालातों और ख्वाहिशों 
कहाँ गुज़रती है,
रवायतों में न सही अब खिदमतों में ही
समझदारी है ,इसलिए
ख्वाबों को छोड़ हम हकीकत की 
पनाह में आ गए हैं..
 ©पम्मी सिंह..


16 दिसंबर 2017

नयी दुनिया


  भूले  तुम , न  भूले  हम 
मोहब्बत किसी की न थी कम 
दुनिया के झूठे रीति - रिवाजो ने 
धर्म से निकले अल्फाजों ने 
इस जहाँ से हमें मिटा दिया 
उसे दफनाया,  मुझे जला दिया 
जिंदगी की बेवफाई समझ में आई 
दी जाती जहाँ धर्मो की दुहाई 
अजीब है दुनिया का  कायदा 
खुदा  भी  बांटा  आधा  आधा 
लेकिन हम मर कर भी जिन्दा है 
खुले आस्मां के आज़ाद परिंदा  है 
जहाँ एक धरती एक है आसमान 
नहीं जहाँ धर्मो  के हैं निशान 
मस्जिद भी मेरी मंदिर भी  मेरा 
अब हर घर पर है अपना बसेरा 
खुश हैं इस दुनिया अंजान में 
नहीं उलझता कोई गीता -कुरान में 
सुर नहीं था जीवन के तरानों में 
अपनापन मिला जाकर बेगानो में 
बादलों के बीच लगता फेरा अपना 
हर सांझ अपनी हर सवेरा अपना 
अब न कोई गम, न कोई सितम 
नयी दुनिया का एक ही नियम 
  भूले  तुम , न  भूले  हम 
मोहब्बत किसी की न थी कम 
हितेश कुमार शर्मा 

15 दिसंबर 2017

सरगम बनकर आजा सजनी.....के.एल. स्वामी ‘केशव’

सरगम बनकर आजा सजनी
मन-मृदंग बजा जा सजनी ....


मैं मयूर बन करूँगा नर्तन
होगा तन-मन सावन-सावन
उमड़-घुमड़कर बन घटा सी
रिमझिम करती छा जा सजनी
सरगम बनकर आजा सजनी
मन-मृदंग बजा जा सजनी ....


कह ले अपनी, सुन ले मेरी
सुख-सपनें या पीर घनेरी
बाँटेंगे मिलकर के दोनों
हाल-ए-दिल सुना जा सजनी
सरगम बनकर आजा सजनी
मन-मृदंग बजा जा सजनी ....


मैं आवारा बादल जैसा
फिरूँ भटकता पागल जैसा
एक ठिकाना दे-दे मुझको
घर-अँगना बसा जा सजनी
सरगम बनकर आजा सजनी
मन-मृदंग बजा जा सजनी ....


फूलों की माला-सा जीवन
इमरत-सा, हाला-सा जीवन
जो कुछ है, होने से तेरे
होजा मेरी, ना जा सजनी
सरगम बनकर आजा सजनी
मन-मृदंग बजा जा सजनी ....

-© के.एल. स्वामी ‘केशव’

14 दिसंबर 2017

आप ही बतलाइए



राजेश त्रिपाठी

किस कदर तब रिश्ते निभेंगे आप ही बतालाइए।
जब स्वार्थ दिल में पलेंगे आप ही बतलाइए।।

जिंदगी में दिल से बढ़ कर  हो गयी  दौलत अभी।
नाते-रिश्ते इस जहां के जब इसी पर टिके हैं अभी।।
होठों पर नकली मुसकानें,  दिल में नकली प्रीति ।
नकली चेहरा सामने रखते जग की यह है  रीति।।

ऐसे में  सच क्या  पनपेगा आप  ही बतलाइए ।
जब स्वार्थ ही दिल में पलेंगे आप ही बतलाइए।।

झोंपड़ी में है अंधेरा और कोठी मे  दीवाली है।
कोई मालामाल तो  कोई दामन ही खाली है।।
धरती  पर  जन्नत  जैसी कोई जिंदगानी है।
कोई बस मुसलसल इक गुरबत की कहानी है।।

ऐसे में कोई क्या करे आप ही बतालाइए।
जब स्वार्थ दिल में पलेंगे आप ही बतलाइए।।

रो रही सीताएं यहां दुष्टों के रावण राज में।
किस कदर हाहाकार है अब के समाज  में।।
कुछ लोग निशिदिन चल रहे ऐसी चाल हैं।
देश की आबादी जिससे बेतरह बेहाल  है।।

रंजोगम कैसे मिटेंगे आप ही बतलाइए।
जब स्वार्थ ही दिल में पलेंगे आप ही बतलाइए।।

जिंदगी जिनके लिए बोझ-सी है बन गयी।
मुसीबतों की कमाने गिर्द जिनके तन गयीं।।
कोई राहतेजां नहीं कोई किनारा है नहीं।
इन मजलूमों का यहां कोई सहारा है नहीं।।

ये जहां में कैसे जिएं आप ही बतलाइए।
जब स्वार्थ ही दिल में पलेंगे आप ही बतलाइए।।













13 दिसंबर 2017

हुस्न



देख कर चंदा को शब में एक शावक बोलता।
ओ ! मेरी मैया बता तू हुस्न आख़िर चीज़ क्या?

हुस्न क्या बाज़ार बिकता या कि ठेलों पे मिला।
आइने को देख इंसां क्यों भला है कोसता?

माँगती गोरी है अक्सर हुस्न उसको दे खुदा।
हुस्न आख़िर क्या बला है तू ज़रा जल्दी बता।

तूने अक्सर ही कहा है हुस्न अच्छी बात में।
और चंदा से सजी ऐसी ही प्यारी रात में।

जिसमें झींगुर गा रहा हो बिन किसी संगीत के।
माँगती जिसमें हो राधा ,एक दिन बस कृशन से।

हुस्न क्या कोई खिलौना जिसको बच्चा माँगता।
और पाकर माँ से अपनी जो बहुत इठला रहा।

चोंच से दाना खिलाकर माँ बहुत इतरा चली।
प्यार से चुग्गे से बोली, "मैं रुको बतला रही।"

पर मियां पहले बताओ आज आख़िर क्या हुआ।
बेतुके से प्रश्न सहसा आज क्यों है पूछता?

शर्म से नज़रे झुका कर चुग्गा फिर हँसने लगा।
घोंसले पर सर लगाकर चुग्गा फिर छिपने लगा।

बोला,"पीपल के तले माँ ,एक आशिक़ कह रहा।
ओ ! मेरी माशूक तुमको हुस्न अल्ला ने दिया।

तब से कुछ ना कुछ सुना है हुस्न के बारे में माँ।
खोजता तब से हुँ इसको रहता आख़िर ये कहाँ ?

बात पे कुछ ग़ौर करके माँ ने चुग्गे से कहा।
"इस जहां में हर तरफ ही हुस्न है बिखरा हुआ।

उसका केवल एक पहलू ही जहां है देखता।
हुस्न को बस जिस्म से सारा जहां है जोड़ता।

हुस्न दुनिया से परे है ये नहीं साकार है।
हुस्न तो इक भावना जिसमें छिपा संसार है।

हुस्न को ही रात भर कवि, काव्य में लिखता रहे।
भोर में सीने लगाकर, चूम कर रोने लगे।

हुस्न परवाने की आँखों में है सदियों से छिपा।
जो सिखा देता उसे है इश्क़ का हर फ़लसफ़ा।

हुस्न मीठे दर्द में जिसमें खड़ी वो पास है।
आँसुओं में भीगना भी हुस्न का आभास है।

हुस्न है उस रात में जिसमें मिटा हर भेद है।
कल्पना सदियों से जिसकी कर रहा बस वेद है।

हुस्न है उस शर्म में जिसमें देहातिन छिप रही।
जब कभी खाँसी सुनाई दे रही है जेठ की।

गाँव की गोरी से जाकर मर्द को जब पूछना।
शर्म से उनका लजाना हुस्न ही है इक नया।

हुस्न है उस रात में जो पागलों सी हो गई।
और प्रिय को खोजती सड़कों पे अक्सर घूमती।

हुस्न है उस आँख में जो दर्द सबका देखती।
विश्व को खुद में समाकर और सब-कुछ भूलती।

थक गया चुग्गा बिचारा ऊँघने सा लग गया।
फिर भी माँ की बात सारी ध्यान से सुनता रहा।

माँ ने आगे फिर कहा ये " हुस्न ही का नूर है।
बेपिये ही मैकदे का शख़्स देखो चूर है।"

इस लिए बेटा ! सुनो तुम हुस्न को मत बाँधना।
ध्यान साँसों पे लगा धीरे से इसको साधना।

राह इसकी है कठिन पर शून्य सा विस्तार है।
ये मिला तो मिल गया समझो तुम्हें संसार है।

बात माँ की सुन रहा चुग्गा कहीं फिर खो गया।
इस से पहले माँ कहे चुग्गा खिसक कर सो गया।


- प्रणव मिश्र'तेजस'